–  अमरेन्द्र यादव |

भारत की पहली आदिवासी स्त्री कथाकार मानी जानेवाली एलिस एक्का, पहली आदिवासी महिला ग्रैजुएट भी थीं. ’50 और ’60 के दशक में साप्ताहिक आदिवासी में छपी उनकी छह कहानियां और उनके द्वारा अनूदित खलील जिब्रान की पांच रचनाओं का संकलन इस किताब में है.

कहानियां बहुत बड़ी नहीं हैं, पर इन छोटे-छोटे क़िस्सों में कही गई बातों के मायने ज़रूर बेहद गहरे हैं. प्रकृति और स्त्री को केंद्र में रखकर लिखी गई ये कहानियां आहिस्ता-आहिस्ता पाठक के दिल में उतर जाती हैं. लेखिका ने जितना महत्व इंसानी भावनाओं को दिया है, उतनी ही मुस्तैदी से पेड़-पौधे, पक्षी, जानवर, नदी, आकाश, जंगल, चट्टान आदि भी इन कथाओं में अपनी सहज उपस्थिति दर्ज कराते हैं. इनमें आदिवासियों की सहृदयता और सरलता है. जैसे कहानी वनकन्या में ओटंगा (अपने बर्बर अनुष्ठानों के लिए मनुष्य रक्त चाहनेवाले लोग) के हमले का शिकार हुए शहरी युवक को वन कन्याएं यानी आदिवासी युवतियां घर लाती हैं और उसकी तीमारदारी करती हैं. वन कन्या फेचो और उस युवक के बीच स्नेह-प्रेम अंकुरित होता है, पर फेचो अपने जंगल-ज़मीन को छोड़कर उस शहरी युवक के साथ नहीं जाना चाहती. दुर्गी के बच्चे और एल्मा की कल्पनाएं नामक कहानी में एक दलित और एक आदिवासी महिला एक-दूसरे की ज़िंदगियों में ताकझांक करने की कोशिश करती हैं. सलगी, जुगनू और अंबा गाछ दो बच्चों राजू और सलगी के निश्छल प्रेम की कहानी है. इसका अंत बेहद मार्मिक है. कोयल की लाड़ली सुमरी में पंद्रह-सोलह वर्ष की अल्हड़, हंसमुख छोकरी सुमरी बलात्कार का शिकार हो जाती है. हालांकि उस हादसे के लिए वह ज़िम्मेदार नहीं है, लेकिन बाहरियों के प्रभाव के चलते बदल रहे आदिवासी समाज के लोग उसे ही दोषी मानते हैं. उसके पेट में एक जीवन पनप रहा है, लेकिन समाज के ठेकेदार उसे और उसके अजन्मे बच्चे को जीने नहीं देना चाहते. द्वंद्व से घिरी सुमरी हाहाकार करती कोयल नदी की तूफ़ानी लहरों के सामने खड़ी हो जाती है.

अपनी कहानियों से एलिस आपको किसी वंडरलैंड में नहीं ले चलतीं. वे तो असल ज़िंदगी से प्रेरित पात्रों और कहानियों को आपके सामने रख देती हैं. कहानियों को सुखद या दुखद बनाने के लिए अपनी ओर से प्रयास नहीं करतीं. उनके लेखन में किसी भी तरह की कृत्रिमता नहीं है और न ही कहानियों की बुनावट में नाटकीयता की झलक दिखती है.

लेखिका: एलिस एक्का (संपादन: वंदना टेटे)  
मूल्य: रु. 200 (हार्ड बाउंड)
राधाकृष्ण प्रकाशन
7/31, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-110 002

First published in Femina.in on 29 March 2017