Description
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का इतिहास अक्सर स्वतंत्रता सेनानियों और ‘कालापानी’ की कहानियों तक सीमित कर दिया जाता है। लेकिन इस इतिहास के पीछे एक और कथा छिपी हुई है—उन झारखंडी आदिवासियों की, जिन्हें अंडमान में ‘रांचीवाला’ कहा जाता है।
बीसवीं सदी की शुरुआत में ये लोग मजदूर, कारीगर और बसने वाले समुदाय के रूप में अंडमान पहुँचे। अपने अथक श्रम, सहजीवन और सामूहिकता से उन्होंने घने जंगलों और कठिन परिस्थितियों वाले ‘आदिम अंडमान’ को एक जीवंत और संगठित समाज में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रसिद्ध मानवविज्ञानी डॉ. एल. पी. विद्यार्थी ने इन्हें इसलिए “आधुनिक अंडमान के निर्माता” कहा था।
यह पुस्तक उसी अनकहे इतिहास को सामने लाती है। यह कहानी 1918 से पहले की भी है—जब संताल हूल और उलगुलान के बाद अनेक आदिवासी निर्वासित होकर ‘कालापानी’ पहुँचे थे। जहाँ भारत के अधिकांश लोगों के लिए अंडमान भय और दंड का प्रतीक था, वहीं रांचीवालों ने इसे अपने ‘देस’ जैसा पाया— हरा-भरा जंगल, काली मिट्टी, नीला समंदर और अपने जैसे लोग।







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