Description
यह किताब पेसा को किसी एक धारा, किसी एक समूह या किसी एक राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि स्वशासन के पुनर्जागरण के वैधानिक प्रयास के रूप में देखती है। ऐसे प्रयास के रूप में, जो संविधान के भीतर रहकर समुदाय की संप्रभुता को सम्मान देता है। यह स्पष्ट करती है कि पेसा न तो परंपरा के विरुद्ध है और न ही संविधान के बाहर। बल्कि पेसा उस बिंदु पर खड़ा है जहाँ परंपरा और संविधान एक-दूसरे को पहचानते हैं, स्वीकार करते हैं और मजबूत बनाते हैं।
क्या ग्राम सभा सर्वोच्च है? हाँ—लेकिन संविधान के भीतर। क्या पंचायतें समाप्त हो जाएँगी? नहीं—वे ग्राम सभा की कार्यकारी इकाइयाँ हैं। क्या प्रशासन का अधिकार खत्म हो जाएगा? नहीं—लेकिन वह अब समुदाय की सहमति से संचालित होगा। क्या विकास रुकेगा? नहीं—बल्कि वह स्थानीय जरूरतों और निर्णयों से दिशा पाएगा।







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