Description
‘वन के मन में’ (Vana Ke Mana Main) में एक भी ऐसा पात्र नहीं है जो वन के बाहर के जीवन का प्रतिनिधित्व करता हो। इसलिए वहाँ नकली सभ्यता और आचार-विचार का प्रवेश नहीं हुआ है। …वन जीवन की एकरूपता अखंडित रही है। …इस उपन्यास में जहाँ यह स्पष्ट होता है कि वन में कितना अपार सौंदर्य है, शांति है और निश्चिंतता है वहाँ यह भी स्पष्ट होता है कि यहाँ जीवन-यापन में कितनी कठिनाइयाँ हैं, रहने-सहने में कितनी असुविधा है और कितना संघर्ष है। लेकिन यह सब होते हुए भी जीवन का सौंदर्य और आनंद इन सब के ऊपर छलकता रहता है। इसी अर्थ में वन जीवन साधारण सभ्य जीवन से भिन्न है। कठिनाइयाँ वहाँ भी हैं लेकिन वहाँ मनुष्य निराश और हताश नहीं है, उसके होठों पर मुस्कान है और कंठों में गान, पाँवों में थिरकन है और कमर में लचक। विषम आर्थिक संघर्ष उन्हें तोड़ नहीं देते और न व्यक्ति, व्यक्ति को अलग करते हैं। उनका सामूहिक जीवन अब भी अव्याहत भाव से आगे बढ़ रहा है। …‘वन के मन में’ हर दृष्टि से एक अद्भुत वन-उपन्यास है।
– श्यामसुंदर घोष, 1964







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